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August 29, 2025 10:52 pm

पचास वर्षों की सेवा… अब सम्मान दो!” — आंगनबाड़ी बहनों का हक़ की हुंकार, पीएम-सीएम से न्याय की पुकार!

पचास वर्षों की सेवा… अब सम्मान दो!” — आंगनबाड़ी बहनों का हक़ की हुंकार, पीएम-सीएम से न्याय की पुकार!

Mahasamund/छत्तीसगढ़ की धरती पर नारी सेवा का वो स्तंभ, जो आधी सदी से बिना रुके, बिना थके, गांव-गांव, घर-घर तक कुपोषण के खिलाफ जंग लड़ रही थीं—आज वही आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं अपने सम्मान और अधिकारों के लिए न्याय की गुहार लगा रही हैं।

2 अक्टूबर 1975 को जब भारत सरकार ने एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) की शुरुआत की थी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि ये महिलाएं देश की सबसे जमीनी सेवा की रीढ़ बन जाएंगी। लेकिन आज, 50 वर्षों बाद भी उनकी स्थिति वही है—न सम्मान, न अधिकार, न स्थायित्व।

अब छत्तीसगढ़ की एक लाख से अधिक आंगनबाड़ी बहनों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को संयुक्त पत्र भेजकर साफ शब्दों में कहा है—”अब बहुत हो चुका! अब सम्मान चाहिए, अधिकार चाहिए, सरकारी दर्जा चाहिए!”

समर्पण से संघर्ष तक: पचास वर्षों की पीड़ा!
पिछले पचास वर्षों से ये आंगनबाड़ी कार्यकर्ता न केवल बच्चों को पोषण, टीकाकरण, शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा दे रही हैं, बल्कि महिलाओं को जागरूक करने, प्रसवपूर्व देखभाल, किशोरी बालिकाओं की शिक्षा और कुपोषण मिटाने में भी अगली पंक्ति में खड़ी रही हैं।

लेकिन बदले में उन्हें क्या मिला?
मात्र ₹10,000 प्रति माह मानदेय (कार्यकर्ता को) और ₹5,000 (सहायिका को)।

महंगाई, परिवार, बच्चों की पढ़ाई, सामाजिक जिम्मेदारियां और अब तकनीकी बोझ—FRS, e-KYC, फेस कैप्चर जैसी जटिलताओं ने इनका जीवन एक मशीन में बदल दिया है।

मांगों की फेहरिस्त: एक पुकार, जो अब गूंज बन चुकी है!उनके द्वारा भेजे गए पत्र में मांगे स्पष्ट हैं—शासकीय कर्मचारी का दर्जा।

• ₹26,000 (कार्यकर्ता) और ₹22,100 (सहायिका) का मासिक मानदेय।

• पेंशन, सामाजिक सुरक्षा, बीमा और चिकित्सा सुविधा।

• डिजिटल जटिलताओं से मुक्ति—FRS, e-KYC, मोबाइल ऐप की बाध्यता समाप्त हो।

• राज्य और केंद्र के बीच जिम्मेदारी टालने की राजनीति खत्म हो।

उन्होंने लिखा है—
“हम मशीन नहीं हैं, हम नारी शक्ति हैं। हमने पचास साल दिए हैं देश को, अब देश हमें सम्मान दे!”

सरकारें बदलती रहीं, हालात वही रहे पत्र में पीड़ा झलकती है—
“जब-जब हमने मांग उठाई, तब-तब केंद्र ने राज्य की ओर और राज्य ने केंद्र की ओर उंगली दिखाई। हमें टालते रहे। लेकिन अब जब दोनों जगह एक ही राजनीतिक दल की सरकार है, तो अब कोई बहाना नहीं बचा।”

यह टिप्पणी सीधे सत्ता के संवेदनशील बिंदुओं को छूती है। जब “नारी सशक्तिकरण” की बातें मंचों पर होती हैं, तो इन जमीनी नायिकाओं की अनदेखी सवाल उठाती है।

आंदोलन की चिंगारी बन गई मशाल!
अब यह केवल पत्राचार नहीं रहा—यह आंदोलन बन चुका है। महासमुंद जिले से लेकर राज्य के कोने-कोने तक, ये महिलाएं एकजुट हो चुकी हैं।

प्रदेश अध्यक्ष सुधा रात्रे महासमुंद, सुलेखा शर्मा जिला अध्यक्ष महासमुंद, लल्ली आर्य,हाजरा खान, छाया हिरवानी, अन्नपूर्णा वैष्णव, विभा साव साहू, सुशीला ठाकुर, सत्यभामा जनक, सायर खान और कई अन्य बहनों ने अपने गांव से निकलकर पूरे राज्य में एक ऊर्जा का संचार किया है।

उनकी आवाज़ कहती है—
“हम चुप थीं, लेकिन कमजोर नहीं थीं। अब हमारी चुप्पी तूफान बनेगी।”

यह सिर्फ पत्र नहीं, हमारी आत्मा की चीख है’!
पत्र के अंतिम पंक्तियों में लिखा गया है—”यह मात्र एक आवेदन नहीं है, यह हमारी आत्मा की चीख है। यह हमारी पीड़ा, समर्पण और अब सम्मान पाने की आकांक्षा की आवाज है। सरकार अगर वाकई में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ को धरातल पर लाना चाहती है, तो पहले उन बेटियों को पहचाने जो नन्हें बच्चों की पहली शिक्षिका बनकर खड़ी हैं।”

आंगनबाड़ी बहनों की अब फैसले की घड़ी!
देश की उन महिलाओं की यह पुकार अब सड़क से संसद तक पहुंच चुकी है। हर पंचायत, हर गांव, हर ब्लॉक से एक ही स्वर में आवाज़ उठ रही है—
“हम आंगनबाड़ी हैं… हम सेविका नहीं, अब देश निर्माता कहलाना चाहती हैं!”

अब देखने वाली बात यह है कि क्या सरकार इस पुकार को सुनती है? क्या नारी शक्ति के इन जमीनी स्तंभों को वह दर्जा मिलेगा, जिसके वे दशकों से हकदार रही हैं?

क्योंकि अब यह सिर्फ एक मांग नहीं,”पचास वर्षों की सेवा का अंतिम अध्याय है — जिसे या तो सम्मान से लिखा जाएगा… या संघर्ष से!”

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